आखरी ख़त
मुलाक़ातों में कुछ बातों में ही दीदार हो गयाअनजाने में मुझको कब न जाने प्यार हो गयाजो तूने कह दिया कि हो नही सकता है ये मुमकिनमैं खुद की ही नज़र में खुदका गुनहगार हो गया पता होता अगर मुझको तो इतना मैं नही गिरतातुझे पाने की चाहत में ना ही हद पार मैं करतामुझे फिरसे संभलने का अगर मौक़ा दिया होतातुझे भी भूल जाता … Continue reading आखरी ख़त
